Saturday, December 10, 2011
निर्वाण
Friday, November 18, 2011
फिर कभी
अभी अधूरा है
तलाश का सफर
अभी पकड़ रहीं हूँ
पानी में घुल गई
अपनी परछाई
अभी गिन रही हूँ
हवा में मिल गये
सांसों के साल
ढून्ढ रही हूँ
चले हुए कदमों के
[[[[[[[रास्ते
सुनती हूँ
शब्दों में गुम्म
अपने हिस्से के
गीतों के बोल
छोड़ आई हूँ पीछे
कितनी मंजिलों के
मील पत्थर !
अभी मेरा चिन्तन अधूरा
अधूरी नज्में
अधूरी ज़िन्दगी की परिभाषा !
ढून्ढ रही हूँ
अधूरी हस्ती का
गुम्म हुआ आधापन
अभी तो मैं रहूंगी अधूरी
पूर्ण हूँगी फिर कभी !
Tuesday, October 25, 2011
पल
Sunday, February 13, 2011
तू मिलना ज़रूर…

सुरजीत
हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव
तू बेशक
कड़कती धूप बनकर मिलना
या गुनगुनी दोपहर की गरमाहट बन
घोर अंधेरी रात बनकर मिलना
या सफ़ेद-दुधिया चाँदनी का आँगन बन
मैं तुझे पहचान लूँगी
रिमझिम बूँदों की टप-टप में से
दावानल में जलते गिरते
दरख़्तों की कड़-कड़ में से
मलय पर्वत से आतीं
सुहानी हवाओं की
सुगंधियों में मिलना
या हिमालय पर्वत की
नदियों के किनारे मिलना
धरती की कोख में पड़े
किसी बीज में मिलना
या किसी बच्चे के गले में लटकते
ताबीज़ में मिलना
लहलहाती फ़सलों की मस्ती में
या गरीबों की बस्ती में मिलना
पतझड़ के मौसम में
किसी चरवाहे की नज़र में उठते
उबाल में मिलना
या धरती पर गिरे सूखे पत्तों के
मैं तुझे पहचान लूँगी…
किसी नर्तकी के नृत्य की लय में से
किसी वीणा के संगीत में से
किसी हुजूम के शोर में से।
तू मिलना बेशक
किसी अभिलाषी की आँख का आँसू बन
किसी साधक के ध्यान का चक्षु बन
किसी मठ के गुम्बद की गूँज बन
या रास्ता खोजता सारस बन
तू मिलना ज़रूर
मैं तुझे पहचान लूँगी।
Monday, January 24, 2011
दहलीज़

दहलीज़
पहली उम्र के
वे अहसास
वे विश्वास
वे चेहरे
वे रिश्ते
अभी भी चल रहे हैं
मेरे साथ-साथ।
यादों के कुछ कंवल
अभी भी मन की झील में
तैर रहे हैं ज्यों के त्यों।
सुन्दर-सलौने सपने
अभी भी पलकों के नीचे
अंकुरित हो रहे हैं
उसी तरह।
तितलियों को पकड़ने की
उम्र के चाव
अभी भी मेरी हथेलियों पर
फुदक-फुदक कर नाच रहे हैं।
इन्द्र्धनुष के सातों रंग
अभी भी मेरी आँखों में
खिलखिलाकर हँस रहे हैं।
मेरे अन्दर की सरल-सी लड़की
अभी भी दो चुटियाँ करके
हाथ में किताबें थामे
कालेज में सखियों के संग
ज़िन्दगी के स्टेज पर
‘गिद्धा’ डालती है।
हैरान हूँ कि
मन के धरातल पर
कुछ भी नहीं बदलता
पर आहिस्ता-आहिस्ता
शीशे में अपना अक्स
बेपहचान हुआ जाता है।
00
(सुरजीत जी की उक्त दोनों कविताओं का हिन्दी अनुवाद तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लॉग “आरसी” में छपी उनकी पंजाबी कविताओं से किया गया है।)
प्रस्तुतकर्ता सुभाष नीरव पर १०:२५ अपराह्न 7 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक
Monday, January 17, 2011
गुमशुदा
बहुत सरल लगता था
कभी
चुम्बकीय मुस्कराहट से
मौसमों में रंग भर लेना
सहज ही
पलट कर
इठलाती हवा का
हाथ थाम लेना
गुनगुने शब्दों का
जादू बिखेर
उठते तुफानों को
रोक लेना
और बड़ा सरल लगता था
ज़िन्दगी के पास बैठ
छोटी-छोटी बातें करना
कहकहे मार कर हँसना
शिकायतें करना
रूठना और
मान जाना…
बड़ा मुश्किल लगता है
अब
फलसफों के द्वंद में से
ज़िन्दगी के अर्थों को खोजना
पता नहीं क्यों
बड़ा मुश्किल लगता है…
00
Monday, January 10, 2011
एक दिया

एक दिया
इस बार जब
दीवाली के दिए जलाएं
तो एक दिया
उनके नाम का भी जलाना
जो हाथों में मशालें पकड़
काफिलों के आगे हो चले !
हक्क और सच की जीत की खातिर
हकूमतों से लड़े
और आने वाली पीडिओं का
रास्ता सवांरने के लिए
सूलिओं पे चड़े !
एक दिया उनके नाम का भी जलाना
जिनकी कुर्बनिओं की
कभी भी किसी ने भी चर्चा न की
जिनके परिवार वालों ने
उनकी दी कुर्बनिओं की खातिर
ज़ुल्म सहे
और खुद्कशियां कीं !
इस दीवाली
उनके नाम का बस
एक दिया जला देना
बस एक दिया !
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